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राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा लागू

लंबे समय से चले आ रहे हैं अयोध्या राम मदिंर का मुद्दा आह्वानों के बावजूद मामले से जुड़ा कोई भी पक्षकार कोर्ट से मनमुताबिक फैसला नहीं आने की स्थिति में उसे मानने को तैयार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को निर्धारित सुनवाई रद्द कर दी क्योंकि मामले की सुनवाई कर रही सांविधानिक बेंच के पांच जजों में से एक जज उपलब्ध नहीं थे.

मामले से जुड़े पक्षकारों में धैर्य कम होने लगा और दोनों तरफ से जल्द सुनवाई की मांग की गई. मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब का कहना है कि -'सुप्रीम कोर्ट में ये तारीख पर तारीख गलत है. ये देरी गलत है.' सुप्रीम कोर्ट में 29 जनवरी की सुनवाई टलने के बाद हिन्दू संत भी इसी तरह की भावनाएं जता रहे हैं, लेकिन जब इंडिया टुडे के अंडरकवर रिपोटर्स टाइटल विवाद के दोनों तरफ के पक्षकारों तक पहुंचे तो उनमें से कोई भी अदालत का अपने मनमुताबिक फैसला ना आने पर उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखा. साथ ही उन्होने कहा कि 'आप क्या समझते हैं कि अगर फैसला दूसरे पक्ष के हक में आया तो कोई वहां एक भी ईंट रख सकेगा. मैंने उन्हें चुनौती दी है कि जब तक मैं जिंदा हूं, मैं एक ईंट को भी रखने की इजाजत नहीं दूंगा.'

हाजी महबूब ने साथ ही चेतावनवी दी कि- 'सार्वजनिक तौर पर मैं कह रहा हूं जब भी फैसला आएगा उसे हम देखेंगे. लेकिन आपको सच बताऊं कि कोई मुसलमान इसे नहीं मानेगा (अगर फैसला दूसरे पक्ष में आता है).'

सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू होगा

एक्टिविस्ट और इस्लामी स्कॉलर असद खान फलाही ने कानूनी तौर पर मसले के हल की बात कही. उन्होंने कहा, 'पक्षकार अंतिम शब्द नहीं है. मैं इस तरह के बयान सुनता आ रहा हूं. एक ही बात लागू होगी और वो है सुप्रीम कोर्ट व संविधान का फैसला.'

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य महमूद पराचा ने फलाही की बात को दोहराया. उन्होंने कहा, 'भारत में, भारत का संविधान ही प्रबल होगा. हो सकता है कि मुझे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुशी नहीं मिले, लेकिन मुझे उस फैसले को स्वीकार करना होगा.'

उन्होंने कहा, 'हाजी साहब भारत के संविधान को चुनौती देने वाले कौन होते हैं. जो कोई भी ऐसा करेगा, उसका पूरी ताकत से विरोध किया जाएगा. हम उसकी आवाज को कानूनी तरीके से दबा देंगे. एक बार फिर मैं यह पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि भारत का संविधान ही सर्वोच्च है.'


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