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Karnataka Verdict: पीएम मोदी का चला जादू, अब येदियुरप्पा बनेंगे ‘कर्नाटक के किंग’

 

कर्नाटक: बीएस येदियुरप्पा एक ऐसा नाम जिसके बिना बीजेपी कर्नाटक में खुद को कहीं नहीं पाती है। जातीय समीकरण हों या फिर जोड़-तोड़ की बात, येदियुरप्पा ने अलग तरीके से कर्नाटक की राजनीति में खुद को स्थापित किया है।

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा एक ऐसा नाम, जिसके बिना बीजेपी का अस्तित्व अधूरा है। येदियुरप्पा ने खुद को राज्य में स्थापित करने और विकसित करने में किसी तरह की कमी नहीं छोड़ी है। उनके बलबूते ही बीजेपी ने दक्षिण में पहली बार जीत का स्वाद चखा था। हालांकि, उनका मुख्यमंत्रीत्व काल काफी विवादित रहा और तीन साल बाद खनन घोटाले में फंसने पर उनकी कुर्सी चली गई, लेकिन उनका वजूद ऐसा है कि बीजेपी ने इस बार भी उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा।

 

छात्र जीवन से राजनीति में सक्रिय

मांड्या जिले के बुकानाकेरे में 27 फरवरी, 1943 को लिंगायत परिवार में येदियुरप्पा का जन्म हुआ। आपको बता दें कि राज्य की राजनीति में लिंगायत वोट बैंक का खासा असर है। छात्र जीवन से ही वह राजनीति में सक्रिय रहे और साल 1972 में उन्हें शिकारीपुरा तालुका जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया। इस दौरान वह एक चावल मिल में क्लर्क का भी काम करते रहे। साल 1977 में जनता पार्टी का सचिव बनने के बाद वह पूर्णरूप से राजनीति में सक्रिय हो गए। साल 1983 में वह पहली बार विधानसभा पहुंचे, वह दो बार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं।

 

सीएम पद से देना पड़ा था इस्तीफा

साल 2007 में कर्नाटक में राजनीतिक उलटफेर हुए और वहां राष्ट्रपति शासन लग गया, ऐसे में जेडीएस और बीजेपी ने अपने मतभेद दूर किए और मिलकर सरकार बनाई। येदियुरप्पा के लिए यह लकी साबित हुआ और 12 नवंबर, 2007 को वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, वह ज्यादा दिन तक इस कुर्सी पर बने नहीं रह पाए और जेडीएस से मंत्रालयों के प्रभार को लेकर हुए विवाद के बाद 19 नवंबर, 2007 को ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

 

साल 2008 में जबरदस्त जीत 

साल 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने वहां जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए सरकार बनाई। इस बार फिर येदियुरप्पा बीजेपी के चेहरे के तौर पर सीएम बने, लेकिन तीन साल दो महीने का उनका कार्यकाल काफी विवादों में रहा। कथित भूमि घोटाले से लेकर खनन घोटाले तक में उनका नाम आता रहा। इस दौरान लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद उनकी कुर्सी चली गई।

लिंगायत फैक्टर का असर

सीएम की कुर्सी जाने के बाद येदियुरप्पा बीजेपी से अलग हो गए, ऐसे में लगा कि वह पूरे लिंगायत फैक्टर के साथ अपने बल पर राजनीति करेंगे, लेकिन बीजेपी को यह समझते देर नहीं लगी कि येदियुरप्पा के बिना राज्य में उसका कोई जनाधार नहीं रह जाएगा, ऐसे में 2018 में भी बीजेपी ने उन्हें अपना सीएम पद का उम्मीदवार बनाया और कर्नाटक में कमल खिलाया।


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