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1968 में स्थापित हुए इस शहर में नहीं है कोई धर्म, न पैसा और ना ही कोई सरकार

 

चेन्नई से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसा शहर है जहां न तो धर्म है, न पैसा है और ना ही कोई सरकार। इस जगह का नाम है ऑरोविले जिसकी स्थापना 1968 में मीरा अल्फाजों ने की थी। ऑरोविले नामक इस जगह को सिटी ऑफ डॉन यानी भोर का शहर भी कहा जाता है। 'ओरोविले' शब्द का मतलब एक ऐसी वैश्विक नगरी से है, जहां सभी देशों के स्त्री-पुरुष सभी जातियों, राजनीति तथा सभी राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर शांति एवं प्रगतिशील सद्भावना की छांव में रह सकें।

 

बता दें इस शहर को बसाने के पीछे सिर्फ एक ही मकसद था कि यहां पर लोग जात-पात, ऊंच-नीच और भेदभाव से दूर रहें। यहां कोई भी इंसान आकर बस सकता है लेकिन इसके लिए एक शर्त रखी गई है। शर्त सिर्फ इतनी है कि उसे एक सेवक के तौर पर यहां रहना होगा। यह एक तरीके की प्रयोगिक टाउनशिप है जो की विल्लुप्पुरम डिस्ट्रिक तमिलनाडु में स्थित है।

 

साल 2015 तक यह शहर आकार में बढ़ता चला गया और इसे कई जगह सराहा भी जाने लगा। आज इस शहर में करीबन 50 देशों के लोग रहते हैं। इस शहर की आबादी तकरीबन 24000  है। यहां पर एक भव्य मंदिर भी है।

 

आपने सभी मंदिरों में किसी न किसी देवी-देवता की तस्वीर या मूर्ति देखी होगी लेकिन ऑरोविले के मंदिर में ऐसी कोई मूर्ति या तस्वीर आपको देखने को नहीं मिलेगी। दरअसल, यहां धर्म से जुड़े भगवान की पूजा नहीं होती। यहां लोग आते हैं और सिर्फ योगा करते हैं।

 

नगर के बीचों बीच मातृमंदिर स्थित है। यूनेस्को ने भी इस शहर की प्रशंसा की है। भारत के राषट्रपति रहते हुए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल भी ऑरोविले का दौरा कर चुके हैं। 

 


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